एनिमिया मुक्त भारत अभियान में जन भागीदारी
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देवास 02 सितंबर 2023/भारत सरकार की महत्ती योजना अल्परक्तता उन्मूलन अभियान एवं कुपोषण उन्मुलन अभियान को प्राथमिकता देते हुए डॉ. शर्मिला मित्तल व उनके सहयोगी डॉक्टर व नर्सिगं स्टॉफ की टीम को देवास जिले को एनिमिया मुक्त एवं कुपोषण मुक्त करने के लिए मनोनित किया है। अभियान में अभी तक डॉक्टर्स द्वारा 1012 गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली 300 माताओं (धात्री), रजोनिवृत्ति वाली 204 महिलाओं को एवं 18 वर्ष तक के 1121 बच्चों का परिक्षण और उपचार कर उन्हें स्वास्थ लाभ पहूॅचाया जा चुका हैं।
कुसमानिया, सतवास, बाईजगवाड़ा, लोहारदा, कांटाफोड़, पानीगांव, बाईजगवाड़ा, डबलचौकी बरोठा, (राजोदा,पटाड़ी) ग्राम कि सरकारी स्वास्थ केन्द्र व आसपास की आगनवाडी पर जाकर यह कार्य सफलता पूर्वक किया जा चुका हैं। और यह कार्य अन्य स्थानों पर निरन्तर किया जा रहा है।
अभियान का लक्ष्य देवास जिले कि मातृ मृत्यु दर शिशु मृत्यृ दर को कम करना है। प्रत्येक शिशु 2.5 किलोग्राम से 3.5 किलोग्राम का हो प्रत्येक माता पूर्णतः स्वस्थ हो। इसके अन्तर्गत पोषण तत्व संबधी आवश्यक दवाईया, इंजेक्शन, आयरन, सुकरोज, फोलिक एसिड, विटामिन बी12, बी काम्प्लेक्स, विटामिन सी, विटामिन ड़ी, मल्टीविटामिन इंजेक्शन, केल्सियम डी3, डी वर्मिगं आदि दवाईयॉ वितरित की और इन्जेक्शन लगाए।
प्रथम चरण मे जिले कि प्रत्येक आगंनवाडी से जुडी गर्भवती महिला धात्री (स्तनपान कराने वाली माता) और रजोनिवृत्ति महिलओं को और 0 से 6 आयु के बच्चों का स्वास्थ परिक्षण कर उन्हे स्वास्थ लाभ पहुॅचाना , पौषक तत्वों से युक्त आहार की जानकारी देना, अपने आसपास, स्वयं की स्वच्छता और अपने घर के आस पास कि साफ-सफाई न रखने से होने वाली बिमारियों कि जानकारी देना हैं।
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दूसरे चरण में जिले के समस्त सरकारी स्कूलों में स्वास्थ परिक्षण करेगें व जिन बच्चों में अल्परक्तता (ऐनिमिया) एवं पोषण तत्वों की कमी पाई जाती हैं तो उनका इलाज किया जाएगा और उन्हें स्वच्छता और पोषक तत्वों के आहार के बारे में बताया जाएगा।
तीसरे चरण में जिले के समस्त सरकारी छात्रावास और महाविद्यालयों के युवक और युवतियों का स्वास्थ परिक्षण व इलाज किया जावेगा।जिन युवक युवतियों में अल्परक्तता (ऐनिमिया) एवमं पोषण तत्वों की कमी पाई जाती हैं तो उनका इलाज किया जाएगा।
तीन माह पश्चात् सभी लोगों का पुनः परिक्षण व अन्य लोगों को भी देखा जाएगा अगस्त माह से सोनकच्छ विकास खण्ड का देवास विकास खण्ड में साथ - साथ काम करने का प्रस्ताव हैं सोनकच्छ व देवास में सप्ताह में एक जगह पर एक बार केम्प किया जाएगा। आम जनता से अनुरोध है कि ज्यादा से ज्यादा संख्या में स्वास्थ परिक्षण करवाए और लाभ पाए।
अल्परक्तता उन्मुलन अभियान भारत वर्ष में केन्द्र सरकार द्वारा सन् 2018 से प्रारम्भ किया गया हैं। परन्तु 5 साल होने के बावजूद जनमानस में अल्परक्तता के प्रति जागरूकता उत्पन्न नही हुई हैं।
भारत में 2019-2021 के सर्वे के आधारित पुरूषों में 25 प्रतिशत अल्परक्तता, महिलाओं में 57 प्रतिशत 0 से 6 आयु के बच्चों 73 प्रतिशत पाई गई है। हर दुसरी गर्भवती महिला अल्परक्तता से जुझ रही हैं। अमीर हो या गरीब किसी में भी यह अल्परक्तता हो सकती हैं।
राष्ट्रिय पोषण नीति 1993 में अंगीकृत हुई ( भारत वर्ष में प्रारम्भ कि कई ) 1995 में केन्द्र सरकार ने मिड डे मिल योजना शुरू कि गई।2004 मे गर्म पका हुआ भोजन जिसमें प्रति बच्चें को न्यूनतमम 200 दिन प्रति वर्ष प्रस्तावित किया गया। इसमे निम्न प्राथमिक स्तर पर प्रतिद 300 केलोरी और 8 से 12 ग्राम प्रोटिन युक्त भोजन और उच्च प्राथमिक स्तर पर 700 केलोरी और 200 ग्राम प्रोटिन युक्त भोजन देना प्रस्तावित किया गया हैं। समय समय पर डी वर्मिंग करना हफते में दो बर आयरन फोलिक ऐसिड का सायरप, गोलिया देना प्रस्तावित है पर आज तक लोगों को सरकार के इन प्रयासों का महत्व समझ नही आया। इसका मतलब कही ना कही हमारे प्रयासों में ही कमी रही है।
2018 के राष्ट्रीय सर्वे बताते है कि भारत में 0 से 6 उम्रके बच्चे एक वर्ष में 8.8 लाख बच्चें कि मृत्यु हो जाती है, 2017 का सर्वे बताता है, कि 23 प्रतिशत महिलाए, 20 प्रतिशतपुरूष, 6से 23 माह के बच्चे मे 9.6 प्रतिशत को न्यूनतम स्वीकार्य आहार मिल पा रहा है, शेष को किसी ना किसी कारण वर्ष कुपोषण कि समस्या से जुझना पड़ रहा हैं। ज्यादातर माताए अपने शिशु को दो या तीन वर्ष तक स्तन पान ही कराती रहती है नाम मात्र का आहार देना शुरू करती है जबकी शिशु को 6 माह बाद से धीरे धीरे आहार देना शुरू कर देना चाहिए जो कि अधिकांश घर में नही होता। शिशुओं को घर में बनने वाला दाल चावल रोटी सब्जी, फल,गुड,चना,सत्तु, मुगंफली,अंकुरित अनाज आदि खिलाना चाहिए न कि चाय कुरकुरे बिस्किट ।
कुपोषण का प्रमुख कारण पोषक आहर क्या है इसकी जानकारी कि कमी होना है ना कि हमारे देश में खाद्यान कि कमी होना कई तरह कि के अंधविश्वास के चलते हम बच्चों को जो खिलाना चाहिए वो हम नही खिलाते।
अल्परक्तता की वजह से शरीर की कोशिकाओं को पर्याप्त ऑक्सिजन नही मिल पाती है। इसी लिए व्यक्ति को सारे दिन थकान और चिडचिडापन महसूस होता हैं। उसकी कार्य करने कि क्षमता में कमी आ जाती है। थोडा सा काम करने में ही सांस फूलने लगती है । वह रूक रूक कर काम करने लगता है उसे चक्कर आते है आंखों के आगे अधेरां छा जाता है कई बार चक्कर खाकर गिर जाता है व बेहोश भी हो जाता है।
गर्भवती महिलाओं मंे अगर खून कि कमी होती है तो गर्भ का पूर्ण विकास नही हो पाता है प्रथम तीन माह में अगर बहुत ज्यादा हिमोग्लोबिन 6 ग्राम प्रतिषत या उसे कम हो तो फोलिक एसिड विटामिन बी12 कि कमी हो तो न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट,मेनिंगोंमाइलोसिल, एनेनसिफेली, माईक्रोसिफेली, जैसी असाद बिमारियों हो जाती है जो षिषु और उसके माता पिता पर जीवन को भी तकलीफदायक बना देती है, कुछ बच्चों कि असमय मृत्यु भी हो जाती है कई बार प्रथम तीन माह में गर्भपात इन्ही कारणों से हो जाता हैं।
अल्परक्तता की वजह से बच्चों का गर्भ में वजन ठीक से नही बड पाता है उसके शरीर में उसकी माता से मिलने वाले पोषक तत्वों कि कमी हो जाती है इसकी वजह से 1.8 किलोग्राम के बच्चे स्पेशलनियोनेटल केयर युनिट, नियोनेटल इन्टेसिव केयर युनिट में बच्चों को रखना पड जाता है क्योंकि वह शिशु ठीक से मॉ के आचंल से दुध खिच नही पाता है व ठीक से गटक (स्वालो) नही कर पाता है जिस वजह से इन्हे स्पेशल केयर युनिट में रखकर उनका उपचार करना पडता है । इन बच्चों की रोग प्रतिरक्षक क्षमता भी कमजोर होने से वहा पर उन्हे कई प्रकार के रोग लगने की संभावना बड जाती है ।
मां अपना दुध अगर ठीक से हर 2 घटें में नही निकालती है तो उसे धिरे धिरे दुध आना भी कम हो जाता है और बच्चों को ऊपर का दुध- गाया का दुध, बकरी का दुध, पॉवडर का दुध पिलाना पड जाता है जो मॅा के दुध कि तुलना में कई गुना हानिकारक होता हैं। उसमें अनुचित मात्रा में पानी मिलाने से बच्चों को पर्याप्त पोषक तत्व नही मिलते हैं।
पर्याप्त साफ सफाई न रख पाने कि वजह से शिशु को बार बार दस्त लगते रहते है उससे बार बार पानी कि कमी हो जाती है।जिसके कारण शिशु को बार बार अस्पताल में भर्ती करना पडता है। इस सबसे शिशु में कुपोषण के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।इन शिशु ओं का शरीरिक और मानसिक विकास सामान्य शिशुओं के अनुपात में कम ही रहता हैं।
अल्परक्तता की वजह से गर्भवती महिलाओं को 7 और 8 माह में ही प्रसव होने की संभावनाए बड जाती है। रक्त की कमी के कारण यह महिलाएं प्रसव पीडा भी ठीक से सहन नहीं कर पाती है इस कारण से सामन्य प्रसुुति होने में भी परेशानी होती है, कई बार बच्चा गर्भ में ही म्यूकोनियम पास कर देता हैं। जो शिशु कि सांस नली में चला जाता हैं, (गन्दा पानी बच्चें कि छााती में चला जाता है) इस वजह से शिशु होते से ही कई बार रोता नही हैं। उसे बर्थ एस्फेक्सीया हो जाता है व सासं तेज तेज चलने लगती हैं, कभी कभी शिशु को झटके आने लगते हैं, व उनकी मृत्यु होने कि संभावना बड जाती हैं। ऐसे शिशु को एसएनसीयू, एनआईसीयू में भर्ती करना पड जाता है व ऑक्सिजन देेनी पड जाती है वेंटिलेटर तक पर रखना पड जाता हैं। प्रसव के बाद कई बार गर्भासय ठीक से सिकुडता नही हैं, जिस से महिलाओं को अत्यधिक रक्त स्त्राव होने से महिलाओ की मृत्यु भी हो जाती हैं।
अगर शिशु के मस्तिष्क को पर्याप्त आक्सीजन नही मिल पाती है तो उसके मस्तिष्क का कुछ हिस्सा पूर्ण रूप से काम करना बंद कर देता है जो हमें जैसे जैसे शिशु बडा होता है, तब हमें ज्ञात होता है उन शिशु को सेरिब्रल पाल्सी, मेटंल रिटारडेषन, बोल नहीं पाना सून नही पाना किसी अंग का पेरालिसिस हो जाना, आदि लक्षण मिलते है। सत मासी व अठ मासी षिषुओं को भी कई बार हाईपोग्लाईसिमियों , हाईपोथर्मिया, हाईपाेिक्सयाहो जाता है, जिसकी वजह से मस्तिष्क का कुछ भाग क्षतिग्रस्त हो जाता है।
यह शत् प्रतिशत सत्य है, कि एक स्वस्थ मां स्वस्थ शिशु को जन्म दे सकती हैं। एक स्वस्थ शिशु ही स्वस्थ, शक्तिषाली,सर्वगुण सम्पन्न नागरिक बन सकता है।
जो देश के सुपूर्ण विकास में अपनी पूर्ण भुमिका निभा सकता हैं। हमें एक स्वस्थ और स्वच्छ सोच के साथ देश को विकासशील से विकसीत देश कि श्रेणी में पहूॅचाना है इसी लिए प्रत्येक नागरिक का स्वस्थ होना अनिवार्य हैं।


