वैसे तो चुनाव नेता नगरी व पत्रकार जगत दोनो में अपनी अपनी काबिलियत सिध्द करने का मौका होता है
एक ओर जहां नेताओं के द्वारा जनहितकारी कार्यो को लेकर अपना व पार्टी का गुणगान किया जाता है पार्टियों के द्वारा अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए तमाम तरह के प्रयत्न किये जाते हैं और इस कार्य को करने के लिये प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सहारा लेते हैं
इसमें बडे बडे प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से बडे बडे पैकेज की डील की जाती है लेकिन इस डील के बाद भी जब चुनाव परिणाम पर नजर जाती है तो पता चलता है कि जितना पैसा डील पर ख़र्च किया है उसकी उतनी मदद नही हो पायी जितनी की अपेक्षा थी
क्योंकि कई बार जैसा सोचा था वैसा नहीं होता है लेकिन बड़ो के चक्कर में कई छोटे पत्रकारों पर फण्ड में कैची चला दी जाती है जो कि सही नही होता है
मेरा तो ऐसा मानना है कि कोई भी वोट दिलाने की ग्यारंटी नही देता है तो क्यों न समस्त पत्रकारों को के साथ एक ही तरीक़े से व्यवहार किया जाना चाहिए
अभी की ही बात है एक पोर्टल पर मध्यप्रदेश सरकार के लिए एक खबर लगी थी कि वर्ष 2010 से नियम विरुद्ध अधिकारियों की नियुक्ति प्रभारी के रूप में की जा रही है जिसको संज्ञान में लेकर पूरे मध्यप्रदेश में पुनः शासन ने नियमानुसार नियुक्ति की है तो खबर तो असर करती है क्योंकि जब लेखनि में दम होता है व सत्यता के करीब होती है तो असर करती है
